ग्राम भस्को में धूमधाम से मनाया गया भोजली पर्व, पारंपरिक गीतों और रंगों के बीच हुआ विसर्जन
आजाद भारत न्यूज़- प्रदीप पांडेय की रिपोर्ट
खोंगसरा-(कोटा)। ग्राम पंचायत टाटीधार के आश्रित ग्राम भस्को में छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा और संस्कृति से जुड़ा भोजली पर्व उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। गांव के लोगों ने आपसी भाईचारे और मिलजुलकर इस पारंपरिक पर्व को मनाया। महिलाओं, बच्चों और ग्रामीणों ने भोजली की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की।
भोजली छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकपर्वों में से एक है। यह पर्व हरियाली, कृषि, अच्छी बारिश, फसल और आपसी भाईचारे से जुड़ा माना जाता है। ग्रामीण अंचलों में भोजली को केवल धार्मिक परंपरा के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और लोक संस्कृति के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है। भोजली के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक संस्कृति और लोकगीतों से जोड़ने का प्रयास भी होता है।


भोजली को लेकर रहा उत्साह
भस्को में भोजली पर्व को लेकर कई दिनों से ग्रामीणों में उत्साह का माहौल रहा। महिलाओं और बच्चों ने पारंपरिक तरीके से भोजली तैयार की। पर्व के दिन भोजली की पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीण एकत्रित हुए और पूरे उत्साह के साथ भोजली विसर्जन की यात्रा निकाली।
विसर्जन के दौरान ग्रामीण डीजे की धुन पर नाचते-गाते और रंग खेलते हुए तालाब की ओर रवाना हुए। गांव की गलियों से गुजरती भोजली विसर्जन यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। बच्चों और युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक पर्व का उल्लास पूरे गांव में दिखाई दिया।
तालाब में किया भोजली का विसर्जन
ग्रामीण भोजली को लेकर तालाब पहुंचे, जहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद भोजली का विसर्जन किया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने एक-दूसरे को भोजली पर्व की बधाई दी और गांव में सुख-शांति, खुशहाली तथा अच्छी फसल की कामना की।
विसर्जन के बाद ग्रामीणों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। लोगों ने आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं।

लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का पर्व
भोजली पर्व ग्रामीण जीवन में सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस अवसर पर गांव के लोग अपने रोजमर्रा के कामकाज से अलग होकर सामूहिक रूप से पर्व में शामिल होते हैं। भोजली के पारंपरिक गीतों में प्रकृति, खेती-किसानी, वर्षा और खुशहाली की भावनाएं देखने को मिलती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक दौर में भी ऐसे पारंपरिक पर्वों को उत्साह के साथ मनाना जरूरी है, ताकि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, परंपराएं और पारंपरिक गीत आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहें। भस्को में आयोजित भोजली पर्व ने इसी लोकपरंपरा और ग्रामीण एकता की खूबसूरत तस्वीर पेश की।
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