कमरछठ पर महिलाओं ने रखा उपवास, संतानों की लंबी उम्र और निरोगी काया के लिए की पूजा-अर्चना
खोंगसरा/कोटा, बिलासपुर।–आजाद भारत न्यूज़
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़े कमरछठ पर्व को क्षेत्र में श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाओं ने अपने संतानों की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य, निरोगी शरीर और दीर्घायु की कामना करते हुए दिनभर उपवास रखा और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
कमरछठ पर्व को लेकर सुबह से ही महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। महिलाओं ने पारंपरिक पूजन सामग्री की व्यवस्था कर सामूहिक रूप से पूजा की। पूजा स्थल पर भगवान शिव-पार्वती सहित विभिन्न देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की गई। कई स्थानों पर महिलाओं ने एक-दूसरे के साथ मिलकर कथा सुनी और पर्व की धार्मिक मान्यताओं को साझा किया।
छत्तीसगढ़ में कमरछठ को हलषष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतानों के मंगल, स्वस्थ जीवन और लंबी उम्र की कामना के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान पर भगवान की कृपा बनी रहती है तथा परिवार में सुख-शांति आती है।
पारंपरिक तरीके से मनाया गया पर्व
ग्रामीण अंचलों में कमरछठ की पूजा आज भी पारंपरिक तरीके से की जाती है। पूजा में स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री, पसहर चावल, महुआ, दही, फल एवं अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। महिलाएं व्रत के दौरान विशेष नियमों का पालन करती हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करती हैं।

इस पर्व की खास बात यह है कि इसमें छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, ग्रामीण परंपरा और पारिवारिक आस्था की झलक दिखाई देती है। गांवों में महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा कर पर्व की परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य करती हैं।

पंडित राजेश पांडेय ने बताया पर्व का महत्व
पंडित राजेश पांडेय ने कमरछठ पर्व के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हलषष्ठी का पर्व मातृशक्ति की श्रद्धा और संतान के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। इस दिन माताएं अपनी संतान के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुखमय जीवन की कामना से व्रत रखती हैं।
उन्होंने बताया कि हिंदू धार्मिक परंपरा में षष्ठी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। कमरछठ की पूजा में प्रकृति और ग्रामीण जीवन से जुड़ी वस्तुओं का उपयोग भी हमारी प्राचीन परंपराओं और संस्कृति को दर्शाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां और संतान के भावनात्मक रिश्ते तथा छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को जीवित रखने वाली परंपरा भी है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में भी ऐसी परंपराएं समाज को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं। नई पीढ़ी को इन पर्वों के धार्मिक महत्व के साथ-साथ इनके पीछे छिपे सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश से भी परिचित कराना जरूरी है।
कमरछठ के अवसर पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर अपनी संतानों की खुशहाली और दीर्घायु की प्रार्थना की। पूरे क्षेत्र में पर्व को लेकर श्रद्धा और उत्साह का माहौल रहा।
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