फर्जी जाति प्रमाण पत्र से नौकरी का खेल? GPM में बैगा समाज का बड़ा आरोप, राज्यस्तरीय जांच की मांग
बैगा समाज बोला- हमारा हक खा गए बाहरी लोग??
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, आजाद भारत न्यूज़।
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के नाम पर कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर सरकारी नौकरियां हासिल करने का गंभीर मामला सामने आया है। इस मुद्दे ने अब सामाजिक और प्रशासनिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। मंगलवार को बड़ी संख्या में बैगा समाज के लोग कलेक्ट्रेट पहुंचकर विरोध जताया और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए
प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
बैगा समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि वर्षों से कुछ लोगों ने फर्जी दस्तावेजों, गलत वंशावली और कथित कूटरचित अभिलेखों के आधार पर खुद को बैगा जनजाति का सदस्य बताकर जाति प्रमाण पत्र हासिल किए और उन्हीं के आधार पर सरकारी सेवाओं में नियुक्ति प्राप्त कर ली। समाज का दावा है कि शुरुआती जांच में करीब 55 संदिग्ध मामलों की जानकारी सामने आई है, जबकि गहराई से जांच होने पर यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।

इस आंदोलन की अगुवाई अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस की राष्ट्रीय समन्वयक अर्चना पोर्ते और नांगा बैगा जनशक्ति संगठन के पदाधिकारियों ने की। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल कुछ व्यक्तियों का मामला नहीं बल्कि पूरे सिस्टम में गहरी पैठ बना चुके संभावित फर्जीवाड़े का संकेत है।
शिक्षक से लेकर सुरक्षा बल तक नियुक्तियों पर सवाल
बैगा समाज ने आरोप लगाया है कि जिन लोगों पर संदेह है, वे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि जैसे विभागों के अलावा न्यायिक संस्थानों और सुरक्षा बलों तक में पदस्थ हैं। समाज का कहना है कि विशेष पिछड़ी जनजाति के लिए सरकार द्वारा दी गई आरक्षण और विशेष भर्ती की व्यवस्था का लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुंचने के बजाय कथित रूप से अपात्र लोगों ने उठा लिया।

समाज के नेताओं ने कहा कि बैगा समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग है, जिसके उत्थान के लिए विशेष अवसर दिए गए थे। लेकिन यदि फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्तियां हुई हैं, तो इससे असली बैगा युवाओं के अधिकारों का सीधा हनन हुआ है।
“हमारे समाज से कोई संबंध नहीं”
बैगा समाज के लोगों ने आरोप लगाया कि जिन व्यक्तियों ने कथित तौर पर बैगा जाति प्रमाण पत्र बनवाए हैं, उनका समाज से कोई पारंपरिक या सामाजिक संबंध नहीं है। न उनका बैगा समुदाय से रोटी-बेटी का संबंध है, न ही वे बैगा बाहुल्य क्षेत्रों की सामाजिक संरचना का हिस्सा रहे हैं। इसके बावजूद प्रमाण पत्र जारी होना प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
समाज ने मांग की है कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो और यह पता लगाया जाए कि किन आधारों पर जातीय सत्यापन किया गया।
परिवारवार जांच की मांग
बैगा समाज का कहना है कि यदि पूरे मामले की परिवारवार और दस्तावेजी जांच कराई जाए तो कई प्रभावशाली नाम सामने आ सकते हैं। समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि कुछ परिवार वर्षों से सरकारी नौकरी, प्रमोशन और अन्य सुविधाओं का लाभ लेते रहे हैं, जबकि वास्तविक पात्र वंचित रह गए।
कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, आंदोलन की चेतावनी
कलेक्ट्रेट पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने राज्य स्तरीय जाति सत्यापन समिति से जांच कराने, फर्जी प्रमाण पत्र निरस्त करने, दोषियों की नौकरी समाप्त करने और आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की है। प्रशासन की ओर से जांच का आश्वासन दिया गया है, लेकिन समाज ने स्पष्ट कहा है कि यदि जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन जिला स्तर से बढ़ाकर प्रदेश स्तर तक किया जाएगा।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मामला केवल आरोपों तक सीमित रहेगा या जांच के बाद वास्तव में कोई बड़ा खुलासा होगा। फिलहाल बैगा समाज अपने अधिकारों की लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर ले जाने के मूड में नजर आ रहा है।

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