वन अधिकार का पट्टा फिर भी धान बेचने से वंचित बैगा परिवार
260 से अधिक वन अधिकार पत्र, लेकिन करीब 15 परिवार ही बेच पा रहे धान! प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठे सवाल
कोटा-बिलासपुर टाटीधार | प्रदीप पांडेय की रिपोर्ट
वन अधिकार कानून के तहत वर्षों से जंगल में निवासरत आदिवासी परिवारों को उनकी आजीविका और स्व-कृषि के लिए व्यक्तिगत वन अधिकार दिए गए। लेकिन ग्राम पंचायत टाटीधार में वन अधिकार पत्र प्राप्त करने वाले बैगा आदिवासी परिवारों के सामने अब एक ऐसी समस्या खड़ी हो गई है, जिसमें पट्टा होने के बावजूद वे अपनी भूमि पर उत्पादित धान सरकारी खरीदी व्यवस्था में नहीं बेच पा रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन अधिकार पत्र मिलने के बाद भी उनकी भूमि का फसल एवं धान खरीदी के लिए आवश्यक भौतिक सत्यापन नहीं किया जा रहा है। इसके कारण कई परिवार अपनी ही जमीन पर खेती करने के बाद भी सरकारी धान खरीदी व्यवस्था से बाहर हो रहे हैं।
भारत सरकार का वन अधिकार अधिनियम, 2006 वनवासी अनुसूचित जनजातियों को वन भूमि पर आजीविका के लिए स्व-कृषि तथा निवास से जुड़े अधिकारों को मान्यता देता है। अधिनियम की धारा 3(1)(a) में वन भूमि पर स्व-कृषि के लिए कब्जे वाली भूमि के अधिकार को मान्यता दी गई है।
ऐसे में टाटीधार का मामला केवल धान बेचने की समस्या नहीं, बल्कि वन अधिकार पत्र मिलने के बाद उस अधिकार को राजस्व एवं कृषि व्यवस्था में प्रभावी रूप से लागू किए जाने का सवाल भी खड़ा करता है।
अलग-अलग समय में मिले वन अधिकार पत्र, लेकिन रिकॉर्ड का सवाल
ग्राम सरपंच प्रतिनिधि संगीता सम्मार सिंह का आरोप है कि ग्राम पंचायत में लंबे समय से जंगल में निवासरत बैगा आदिवासी परिवारों को अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में वन अधिकार के तहत भूमि के पट्टे दिए गए थे।
उनके अनुसार, ग्राम पंचायत टाटीधार में 260 से अधिक वन अधिकार पत्र वितरित किए गए, लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि इनमें से लगभग 15 परिवार ही अपने वन अधिकार वाली भूमि के आधार पर धान बेच पा रहे हैं।



सवाल यह है कि जिन परिवारों को सरकार ने वन अधिकार पत्र प्रदान किए हैं, उनकी भूमि को सरकारी कृषि व्यवस्था में पूरी तरह दर्ज और मान्य क्यों नहीं किया जा रहा है?
पटवारी ने क्या कहा?
इस संबंध में पटवारी प्रियंका बैगा से जब वन अधिकार पत्रधारक परिवारों की भूमि के भौतिक सत्यापन को लेकर जानकारी ली गई तो उनका कहना है कि उनके पास राजस्व विभाग द्वारा वितरित पट्टों की एक सूची उपलब्ध है।
पटवारी के अनुसार, राजस्व विभाग से प्राप्त सूची में शामिल भूमि के आधार पर ही धान एवं फसल का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। सूची से बाहर के पट्टों का भौतिक सत्यापन वर्तमान व्यवस्था में नहीं किया जा सकता। बाकी पट्टे फर्जी और अवैध है। ऐसे में यह बयान क़ई सवाल खड़ा करते है। विभाग के नए नए नियम जंगलों में वर्षो से रहने वाले आदिवासी परिवारों को कैसे फर्जी बता सकते है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में संबंधित परिवार उच्च अधिकारियों अथवा कलेक्टर से संपर्क करें। वहां से यदि सूची अथवा कोई आदेश प्राप्त होता है, तभी सूची से बाहर के मामलों में भौतिक सत्यापन किया जा सकेगा।
यही बयान अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है।
अगर वन अधिकार पत्र वैध है तो फिर भौतिक सत्यापन क्यों नहीं?
वन अधिकार कानून का उद्देश्य वनवासी समुदायों के आजीविका और पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना है। केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार, अधिनियम में स्व-कृषि एवं आवास से जुड़े व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता दी गई है।
वहीं दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग का कहना है कि राज्य में किसानों को समर्थन मूल्य पर धान एवं मक्का का उपार्जन कराना विभाग की जिम्मेदारी है। वर्तमान व्यवस्था में किसान पंजीयन और भौतिक सत्यापन जैसी प्रक्रियाएं भी संचालित की जाती हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि किसी परिवार के पास सक्षम प्रक्रिया के तहत जारी वन अधिकार पत्र है और वह उस भूमि पर वास्तव में खेती कर रहा है, लेकिन उसका खसरा अथवा भूमि संबंधी विवरण संबंधित राजस्व/कृषि रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है, तो उस विसंगति को दूर करने की जिम्मेदारी किस विभाग की है?
क्या वन अधिकार पत्र और धान खरीदी पंजीयन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं?
जानकारों के अनुसार, वन अधिकार की मान्यता और समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिए किसान पंजीयन दो अलग प्रशासनिक प्रक्रियाएं हो सकती हैं। वन अधिकार पत्र किसी परिवार के वन भूमि संबंधी अधिकार की मान्यता का दस्तावेज है, जबकि धान खरीदी के लिए किसान का भूमि रिकॉर्ड, फसल विवरण, पंजीयन और भौतिक सत्यापन जैसी प्रक्रियाएं आवश्यक हो सकती हैं।
छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग की वर्तमान व्यवस्था में किसान पंजीयन और निरीक्षण के लिए भौतिक सत्यापन की व्यवस्था उपलब्ध है।
यही कारण है कि टाटीधार में अब यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि वन अधिकार पत्र जारी होने के बाद उन परिवारों की भूमि का राजस्व रिकॉर्ड, खसरा, फसल विवरण और किसान पंजीयन से लिंक क्यों नहीं हो पाया।
सरकारी व्यवस्था में रिकॉर्ड की विसंगति से किसान पहले भी परेशान
छत्तीसगढ़ खाद्य विभाग की शिकायत व्यवस्था में भी ऐसे मामले दर्ज हैं, जिनमें किसान के खसरा, फसल विवरण या ऑनलाइन रिकॉर्ड में संशोधन/अपडेट नहीं होने के कारण धान बेचने में परेशानी की शिकायत की गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भूमि और फसल रिकॉर्ड में विसंगति होने पर धान बिक्री प्रभावित हो सकती है।
लेकिन टाटीधार का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में वन अधिकार पत्रधारी परिवार होने की बात सामने आ रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप शर्मा ने बताया सरकारी भेदभाव और अन्याय
सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप शर्मा ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि वन अधिकार कानून का उद्देश्य ही जंगल पर निर्भर आदिवासी परिवारों के अधिकारों को मान्यता देना और उनकी आजीविका को सुरक्षित करना है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार को सरकार ने वन अधिकार पत्र दिया है, परिवार वर्षों से उस भूमि पर खेती कर रहा है और फसल भी पैदा कर रहा है, लेकिन केवल रिकॉर्ड या सूची की प्रक्रिया के कारण वह अपनी उपज सरकारी व्यवस्था में नहीं बेच पा रहा है, तो यह सरकारी व्यवस्था में भेदभाव और अन्याय की स्थिति है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वन अधिकार पत्र प्राप्त परिवारों की भूमि का सत्यापन किस नियम के तहत रोका जा रहा है और यदि कोई रिकॉर्ड संबंधी कमी है तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी हितग्राही की है या संबंधित विभाग की।
उन्होंने कहा कि बैगा परिवार जंगल पर निर्भरता कम कर अपनी भूमि पर खेती करके जीवन बेहतर करना चाहते हैं, लेकिन यदि सरकारी प्रक्रियाएं ही उनके सामने बाधा बन जाएं तो वन अधिकार देने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
विधायक प्रतिनिधि चितरंजन शर्मा का बयान- भाजपा सरकार आदिवासी विरोधी है। तभी आज नए और कठिन नियम बनाकर वन अधिकार पत्र प्राप्त परिवारों को लाभ नही देना चाहते। यह राजस्व विभाग की लापरवाही भी है।
मंडल अध्यक्ष राजू सिंह राजपूत ने कहा कार्यवाही होगी।
मामले पर मंडल अध्यक्ष राजू सिंह राजपूत ने कहा कि बैगा परिवारों की भूमि का सत्यापन न होना एक बड़ा गंभीर विषय है।
उन्होंने कहा कि यदि परिवारों के पास वन अधिकार पत्र हैं और वे अपनी भूमि पर खेती कर रहे हैं, तो उनकी भूमि का सत्यापन नहीं होना राजस्व विभाग की लापरवाही का विषय भी हो सकता है।
राजू सिंह राजपूत ने कहा कि इस पूरे मामले से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा और वन अधिकार पत्रधारी परिवारों की समस्या के समाधान के लिए आवश्यक पहल की जाएगी।
260 से अधिक पट्टे, करीब 15 परिवार ही धान बेच पा रहे—क्यों?
अगर ग्राम पंचायत प्रतिनिधि द्वारा बताए गए आंकड़े सही हैं और 260 से अधिक वन अधिकार पत्र वितरित हुए हैं, जबकि लगभग 15 परिवार ही वर्तमान में उस भूमि के आधार पर धान बेच पा रहे हैं, तो यह अनुपात अपने आप में प्रशासन के सामने जांच का विषय है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि धान क्यों नहीं बिक रहा।
सवाल यह भी है कि—
क्या सभी वन अधिकार पत्र राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं?
क्या सभी संबंधित खसरों की वन अधिकार प्रविष्टि हुई है?
क्या सभी पात्र परिवारों का किसान पंजीयन हुआ है?
क्या उनकी फसल गिरदावरी/फसल विवरण दर्ज है?
क्या भौतिक सत्यापन के लिए केवल राजस्व विभाग की सूची ही आधार है?
और यदि सूची में किसी वैध वन अधिकार पत्रधारी का नाम नहीं है, तो उसे रिकॉर्ड में शामिल कराने की प्रक्रिया क्या है?
बैगा परिवारों को कब मिलेगा अधिकार का वास्तविक लाभ?
बैगा समुदाय को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) में शामिल किया जाता है। ऐसे समुदायों के लिए भूमि, आजीविका और सरकारी योजनाओं तक वास्तविक पहुंच का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
वन अधिकार पत्र केवल कागज का दस्तावेज बनकर न रह जाए, बल्कि उस भूमि पर खेती करने वाले परिवार को फसल बेचने, कृषि संबंधी सुविधाएं प्राप्त करने और पात्र सरकारी योजनाओं से जोड़ने की व्यवस्था भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
टाटीधार के बैगा परिवार अब प्रशासन से यही मांग कर रहे हैं कि उनके वन अधिकार पत्रों की जांच कर वास्तविक पात्रता के आधार पर भूमि का रिकॉर्ड दुरुस्त किया जाए और जिन परिवारों की भूमि पर फसल खड़ी है, उनका नियमानुसार भौतिक सत्यापन कराया जाए।
कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री और वन मंत्री तक पहुंचेगा मामला
सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप शर्मा ने कहा कि इस पूरे मामले को जिला प्रशासन और कलेक्टर के संज्ञान में लाया जाएगा। इसके साथ ही मामले को वन मंत्री और मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की बात कही गई है, ताकि वन अधिकार पत्र प्राप्त बैगा परिवारों को उनके अधिकारों का वास्तविक लाभ दिलाने के लिए आवश्यक कार्रवाई हो सके।
अब देखना होगा कि प्रशासन टाटीधार के इन वन अधिकार पत्रों की वास्तविक स्थिति की जांच कराता है या नहीं और 260 से अधिक वन अधिकार पत्रों में से अधिकांश परिवार धान बेचने से क्यों वंचित हैं, इसका जवाब कब सामने आता है।
रिपोर्ट — प्रदीप पांडेय


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