संदीप शुक्ला और ग्रामीणों ने किया पेंड्रा–बिलासपुर मार्ग पर चक्का जाम — कहा: 7 दिन में नहीं हटेगी तो तालाबंदी करेंगे
बिलासपुर/कोटा। कोटा विकासखंड के ग्राम पंचायत केंदा में खुली शराब दुकान के विरोध में सोमवार को पूर्व जनपद अध्यक्ष संदीप शुक्ला के नेतृत्व में ग्रामीणों ने व्यापक आंदोलन किया। महिलाओं और पुरुषों की बड़ी भीड़ ने पेंड्रा–बिलासपुर मुख्य मार्ग पर बैठकर चक्का जाम कर दिया, जिससे यातायात कई किलोमीटर तक जाम रहा और राहगीरों तथा आवागमन पर असर पड़ा। प्रशासन की टीम और स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और समझौता कर स्थिति नियंत्रित कर पाई।
विरोध की वजह — पहले आवेदन, फिर भी दुकान खुली
केंदा और आसपास के गांवों के लोगों का आरोप है कि वे पहले से ही कलेक्टर कार्यालय तथा संबंधित अधिकारियों को यह मांग लेकर जा चुके थे कि उनका क्षेत्र शराब दुकान के लिए उपयुक्त नहीं है और इससे सामाजिक, पारिवारिक एवं सुरक्षा संबंधी समस्याएँ बढ़ेंगी। इसके बावजूद प्रशासनिक अनुमति मिलने के बाद बिना ग्रामीणों से संवाद किए ही दुकान खोली गई, जिससे नाराज़गी भड़क उठी।

ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने समय-समय पर आवेदन देकर और प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना विरोध जताया था, पर सुनवाई नहीं हुई — यही वजह है कि उन्होंने सड़क जाम जैसा कदम उठाया।
मौके पर क्या देखा गया — महिलाओं ने जताई खास चिंता–
प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल थीं — उन्होंने खुलेआम कहा कि शराब दुकान खुलने से घरेलू हिंसा, घरेलू कलह और बच्चों की सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ेगा। एक पदस्थ महिला ने कहा, “हम अपने बच्चों और परिवार की सुरक्षा के लिए सड़क पर उतरी हैं — दुकान किसी भी हालत में यहाँ नहीं खोलेगी।”
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह आंदोलन केवल दुकानदार के खिलाफ नहीं है, बल्कि सरकारी नीतियों और स्थानीय प्रशासन की अनदेखी के प्रति एक चेतावनी भी है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया — 7 दिन में हटाने का आश्वासन
चक्का जाम की सूचना पाकर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुँचे। अधिकारियों ने ग्रामीणों से लंबी बातचीत की और जांच के बाद 7 दिनों के भीतर दुकान हटाने या दूसरी व्यवस्था करने का आश्वासन दिया। यह आश्वासन मिलने पर ग्रामीणों ने चक्का जाम समाप्त किया, पर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि यदि आश्वासन पूरा नहीं हुआ तो वह तालाबंदी और अन्य बड़े आंदोलन का विकल्प अपनाएँगे।

प्रशासन ने फिलहाल मामला देखने और नियमों के अनुरूप कार्रवाई करने की बात कही, जबकि स्थानीय पुलिस ने मार्ग को खोलने और हालात शांत रखने के लिए अतिरिक्त पेट्रोलिंग का आश्वासन दिया।
प्रदर्शन में शामिल प्रमुख लोग और जनजातीय आवाज़
प्रदर्शन में जिन ग्रामपत्रों और जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया उनमें प्रमुख नाम थे—
ईश्वर तंवर, मन्नू टेकाम, प्रताप भान सिंह, राम पावले, गौरी बाई, श्याम कुमारी, चमेली बाई, राजकुँवर, रामफल, संतोष सिंह, जनपद सदस्य जमुना टेकाम, सरपंच सुखीराम, जनपद सदस्य नेतु यादव, सरपंच गणपत मरावी। सैकड़ों महिलाएँ और पुरुष इस प्रदर्शन में उपस्थित रहे और अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।
जनपद सदस्य जमुना टेकाम ने कहा—“सरकार चाहे तो महतारी वंदन का पैसा वापस ले ले, पर शराब दुकान हमारे गांव में किसी कीमत पर नहीं खुलनी चाहिए।” वहीं पूर्व जनपद अध्यक्ष संदीप शुक्ला ने केंद्र व राज्य की शराब नीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि गांव–गांव में दारू भट्टी खोलकर “सुशासन तिहार” जैसा दिखावा किया जा रहा है जबकि हकीकत में गांवों का विनाश हो रहा है।
मानसिकता और सामाजिक असर — ग्रामीण क्यों सशंकित हैं
ग्रामीण नेताओं का कहना है कि शराब दुकान के कारण:
घरेलू हिंसा और पारिवारिक कलह बढ़ सकते हैं।
रोज़मर्रा की आर्थिक मामलात पर नकारात्मक असर पड़ेगा (घरेलू आय का दुरुपयोग)।
बच्चों और नाबालिगों पर गलत आदतों का प्रभाव पड़ सकता है।
सामाजिक शांति और सार्वजनिक नैतिकता प्रभावित होगी।
इन चिंताओं ने ग्रामीणों को संगठित होकर सडक़ पर उतरने के लिए प्रेरित किया है।
आगे क्या होगा — 7 दिन की कालावधि और संभावित कदम
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को 7 दिनों की मियाद दी है। यदि इस अवधि में दुकान हटाने या समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकला, तो ग्रामीण तालाबंदी, सड़क पर दीर्घकालिक धरना-प्रदर्शन और जिला स्तर पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दे चुके हैं। स्थानीय नेताओं ने कहा कि वे कानूनी रास्ते और जन आंदोलन—दोनों का सहारा लेने के लिए तैयार हैं।
प्रशासन की ओर से की जा रही जांच और निर्णय इस आंदोलन की दिशा तय करेंगे — फिलहाल तनाव कड़ा है और समुदाय सतर्क है।

केंदा में खुली शराब दुकान का मामला स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और ग्राम समाज के बीच विश्वास और संवाद की कमी की ओर इशारा करता है। जहाँ ग्रामीण अपनी सामुदायिक सुरक्षा और पारिवारिक संरचना की रक्षा की मांग कर रहे हैं, वहीं प्रशासन पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नियमों का पालन सुनिश्चित कर चर्चा व संवाद से समाधान निकालने की जिम्मेदारी बनती है। अगले 7 दिनों में जो निर्णय लिया जाएगा, वही इस मामले का वास्तविक निष्कर्ष तय करेगा।
— आज़ाद भारत न्यूज़।
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