खोंगसरा में भव्य रूप से मनाई गई डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती,विचारों की गूंज से जागा समाज।
आजाद भारत न्यूज़ | खोंगसरा-कोटा से विशेष रिपोर्ट-
खोंगसरा (बिलासपुर) — ग्राम खोंगसरा में भारतीय संविधान के शिल्पकार, महान विधिवेत्ता, समाज सुधारक और युगदृष्टा डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती बड़े ही श्रद्धा, उत्साह और गरिमा के साथ मनाई गई। यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, समानता और शिक्षा के महत्व को पुनः स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम बना।
गांव के सभी वर्गों—शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, कर्मचारी, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग—ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और एकजुटता का परिचय दिया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर: संघर्ष, ज्ञान और समानता के प्रतीक
डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का आधार है। एक अत्यंत साधारण और वंचित परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने अदम्य साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति और शिक्षा के बल पर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
उन्होंने बचपन से ही जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता का सामना किया, लेकिन इन कठिनाइयों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति बनाया। उनका प्रसिद्ध कथन—
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”
आज भी समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणास्रोत है।

शिक्षा: परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जो समाज को अज्ञानता और अन्याय से मुक्त कर सकता है। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (ब्रिटेन) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त कर यह सिद्ध किया कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, दृढ़ संकल्प से हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
उनका यह विचार—
“शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा”
आज भी समाज के वंचित वर्गों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
संविधान निर्माता: न्याय, स्वतंत्रता और समानता के रक्षक
भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ. अंबेडकर की भूमिका ऐतिहासिक और निर्णायक रही। उन्होंने ऐसा संविधान तैयार किया जो हर नागरिक को
समानता का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
न्याय और गरिमा का अधिकार
प्रदान करता है।
उनकी दूरदर्शिता के कारण आज भारत एक लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र के रूप में स्थापित है।
सामाजिक न्याय के महान योद्धा
डॉ. अंबेडकर ने जीवनभर दलितों, महिलाओं, श्रमिकों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने ‘मूकनायक’ और ‘बहिष्कृत भारत’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
उनका मानना था कि
“जब तक सामाजिक स्वतंत्रता नहीं होगी, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।”
कार्यक्रम में वक्ताओं ने दिए प्रेरक संदेश
कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने बाबासाहेब के विचारों को आत्मसात करने पर जोर दिया—
राजकुमार राठौर (सेवानिवृत्त शिक्षक)
राजकुमार राठौर ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. अंबेडकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अगर व्यक्ति शिक्षा को अपना हथियार बना ले, तो वह असंभव को भी संभव कर सकता है।
उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार बाबासाहेब ने बचपन में भेदभाव सहा, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे मोबाइल और समय की बर्बादी से बचकर अध्ययन और आत्मविकास पर ध्यान दें।
उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि हम केवल अंबेडकर जयंती मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें।
शिवमान सिंह खुसरो (सरपंच प्रतिनिधि)
शिवमान सिंह खुसरो ने कहा कि आज समाज में जो भी समानता, अधिकार और सम्मान हमें प्राप्त है, वह डॉ. अंबेडकर के अथक संघर्ष का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि पहले समाज में गहरी असमानता थी, लेकिन संविधान ने सभी को समान अधिकार दिया।
उन्होंने ग्रामवासियों से अपील की कि आपसी भाईचारे और समरसता को बनाए रखें और जाति-भेद से ऊपर उठकर समाज के विकास में योगदान दें।

प्रदीप शर्मा (सामाजिक कार्यकर्ता)
प्रदीप शर्मा ने अपने विस्तृत और प्रेरणादायक उद्बोधन में कहा कि डॉ. अंबेडकर केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं।
उन्होंने कहा—
“आज हम जिस लोकतंत्र में सांस ले रहे हैं, वह बाबासाहेब की दूरदर्शिता और संघर्ष का परिणाम है।”
उन्होंने अपने वक्तव्य में चार प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया—
1. शिक्षा और जागरूकता
उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण को विकसित करने का साधन है। जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो सकता।
2. अधिकार और कर्तव्य का संतुलन
उन्होंने कहा कि हमें अपने अधिकारों की जानकारी तो है, लेकिन कर्तव्यों को निभाने में हम पीछे रह जाते हैं। एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए दोनों का संतुलन जरूरी है।
3. संवैधानिक मूल्यों का पालन
उन्होंने कहा कि संविधान केवल एक किताब नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्गदर्शक है। इसमें दिए गए समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को हमें अपने व्यवहार में लाना होगा।
4. सामाजिक एकता और मानवता
उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज तभी मजबूत होगा, जब हम एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना रखें। राजू रामेश्वर सिंह राजपूत (मंडल अध्यक्ष, भाजपा)
उन्होंने कहा कि बाबासाहेब का जीवन हमें यह सिखाता है कि संघर्ष से ही सफलता मिलती है।
उन्होंने शिक्षा को सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए युवाओं से मेहनत करने और लक्ष्य निर्धारित करने की बात कही।
उन्होंने आयोजन समिति को इस भव्य कार्यक्रम के लिए बधाई भी दी।
दिगंबर लाल रोहणी (आयोजक मंडल)
दिगंबर लाल रोहणी ने अपने संबोधन में सामाजिक सुधार पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने कहा कि हमें समाज को नशामुक्त बनाना होगा, क्योंकि नशा युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर समाज को आगे बढ़ाना है, तो हमें संगठित होकर कार्य करना होगा।
उन्होंने सभी ग्रामवासियों और अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन समाज को जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बलराम मरावी (जनपद प्रतिनिधि)
बलराम मरावी ने कहा कि डॉ. अंबेडकर जयंती हमें अपने गौरवशाली इतिहास की याद दिलाती है।
उन्होंने कहा कि महापुरुषों के जीवन और विचारों से प्रेरणा लेकर ही हम समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
उन्होंने युवाओं से समाज सेवा में आगे आने का आह्वान किया।
सालिकराम (शिक्षक)
सालिकराम शिक्षक ने शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा—
“शिक्षा वह शक्ति है, जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाती है।”
उन्होंने कहा कि जितना अधिक हम सीखेंगे, उतना ही समाज में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाएंगे।
उन्होंने अभिभावकों से भी आग्रह किया कि वे अपने बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दें।
सामूहिक संदेश
सभी वक्ताओं के विचारों का सार यही रहा कि—
शिक्षा ही समाज को बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है, संगठन और एकता से ही विकास संभव है, संवैधानिक मूल्यों को अपनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है
रैली, सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा गांव
युवाओं द्वारा पूरे गांव में भव्य रैली निकाली गई
समाज में योगदान देने वाले व्यक्तियों और सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान
केक काटकर जन्मोत्सव मनाया गया
मिष्ठान वितरण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन
आसपास के गांवों के जनप्रतिनिधियों और सरपंचों की भी सक्रिय भागीदारी रही।
विचारों को अपनाने की जरूरत
यह आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश है—
कि अगर हमें एक सशक्त, समान और जागरूक समाज बनाना है, तो हमें डॉ. अंबेडकर के विचारों को अपने जीवन में उतारना होगा।
शिक्षा, समानता और संगठन—इन्हीं तीन स्तंभों पर एक मजबूत और समृद्ध भारत का निर्माण संभव है।
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